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कांवड़ मार्ग पर छुट्टा पशुओं का डेरा, हादसों की आहट के बावजूद बेपरवाह प्रशासन

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कागजों तक सीमित रहीं गौशालाएं, कछला गंगा घाट जाने वाले लाखों कांवड़ियों के लिए आफत बने मवेशी

परविंदर प्रताप सिंह

बदायूं। सावन के पवित्र माह में कछला गंगा घाट से जल लेने के लिए रोजाना लाखों कांवड़िए गुजर रहे हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर जगह-जगह छुट्टा मवेशियों का जमघट लगा हुआ है, जिससे कांवड़ियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि कागजों में गौशालाओं के संचालन का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, जबकि धरातल पर मवेशी सड़कों पर ही डेरा जमाए बैठे हैं।


​कई प्रमुख मार्गों पर मवेशियों का कब्जा

कछला-बदायूं मार्ग से लेकर बदायूं-पटना मार्ग पर स्थिति बेहद खराब है। कुलचौरा, सखानू, अलापुर, म्याऊं और मंशानगला ,जैसे प्रमुख स्थानों पर छुट्टा मवेशी झुंड बनाकर मुख्य सड़क पर ही घूमते और बैठते नजर आते हैं। दिन हो या रात, सड़क के बीचों-बीच बैठे ये पशु कांवड़ियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। रात के अंधेरे में कांवड़ लेकर चल रहे श्रद्धालुओं के लिए अचानक सामने आ जाने वाले पशु सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।

क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा प्रशासन?

स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का आरोप है कि सब कुछ जानते हुए भी जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। कांवड़ यात्रा शुरू होने से पहले मार्गों को सुरक्षित और बाधा रहित बनाने के लंबे-चौड़े निर्देश दिए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद ही व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कोई कदम उठाया जाएगा।

​कागजी दावों की पोल खोलती तस्वीरें

सरकारी आंकड़ों में आवारा पशुओं के संरक्षण के लिए लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं और गौशालाओं के संचालन के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन कांवड़ मार्ग पर बिखरी यह अव्यवस्था स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि गौशालाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। श्रद्धालुओं ने मांग की है कि कांवड़ यात्रा के सुचारू व सुरक्षित संचालन के लिए तत्काल प्रभाव से इन छुट्टा पशुओं को पकड़कर सुरक्षित स्थान पर भिजवाया जाए, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। 

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